अहंकार
रावण जैसे शक्तिशाली के विनाश का कारण बना अहंकार, ऐसा रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा। अहंकार इंसान को भ्रष्ट और फिर नष्ट कर देता है ऐसा अमूमन कहा जाता है।
तो ये अहंकार है क्या ? क्या यह सच में इतना विनाशकारी है?
आज के आधुनिक युग में जब हमें अपने कार्य के वातावरण में, जहां इतनी प्रतिस्पर्धा है, आगे बढ़ने की होड़ है, और के बाद और अधिक पाने की चाह है, क्या ये अहंकार हमारा सहायक है ? या विरोधी है?
अहंकार एक भाव का नाम है, एक मानसिक अवस्था का नाम है।
जब हमें ये लगता है की जो हम हैं, जो हमारा है वो अच्छा है, दूसरे से बेहतर है, चाहे वो विचार हो या सामान, तब ये अहंकार है। हम उसकी उत्तमता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रयास के आवेग में हम दूसरे के विचार या सामान को निम्न मान कर उसे सुनना और देखना बंद कर देते हैं। जीवन के इस पड़ाव पर ये भाव हमारे विकास का बाधक बन जाता है। अहंकार हमें और अच्छा सोचने और पाने से रोकने लगता है।
कुछ लोग कहते हैं की हमारे पास जो है उस पर हमें गर्व होना चाहिए। ये बात बहुत हद्द तक ठीक भी लगाती है। लेकिन ये गर्व का भाव किसी भी क्षण हद्द पार कर घमण्ड बन जाता है और हमें पता भी नहीं चलता।
अहंकार में हम किसी और के पास हमसे बेहतर होने की संभावना को अस्वीकार करते हैं।
तो मेरा मानना यह है कि अपने पास जो है उसके अच्छा होने का विचार बुरा नहीं है लेकिन इससे से भी अच्छा हो सकता है इसकी संभावना को स्वीकार कर आगे बढ़ने में ही अपना हित है। मैं, मेरा, एको हम द्वितीय नास्ति, के भाव से ऊपर उठ कर सोचें और उसके अनुसार व्यवहार करें, लाभ में रहेंगे।
मेरी दादी कहती थी कि जब ये लगे की मेँ सर्वोत्तम हूँ या मेरे पास सर्वोत्तम है तब अपने से ऊपर देखना, लाखों करोड़ों और दिखाई देंगे।
अहंकार आर्थिक और मानसिक विकास में बाधक ही है।
रावण जैसे शक्तिशाली के विनाश का कारण बना अहंकार, ऐसा रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा। अहंकार इंसान को भ्रष्ट और फिर नष्ट कर देता है ऐसा अमूमन कहा जाता है।
तो ये अहंकार है क्या ? क्या यह सच में इतना विनाशकारी है?
आज के आधुनिक युग में जब हमें अपने कार्य के वातावरण में, जहां इतनी प्रतिस्पर्धा है, आगे बढ़ने की होड़ है, और के बाद और अधिक पाने की चाह है, क्या ये अहंकार हमारा सहायक है ? या विरोधी है?
अहंकार एक भाव का नाम है, एक मानसिक अवस्था का नाम है।
जब हमें ये लगता है की जो हम हैं, जो हमारा है वो अच्छा है, दूसरे से बेहतर है, चाहे वो विचार हो या सामान, तब ये अहंकार है। हम उसकी उत्तमता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रयास के आवेग में हम दूसरे के विचार या सामान को निम्न मान कर उसे सुनना और देखना बंद कर देते हैं। जीवन के इस पड़ाव पर ये भाव हमारे विकास का बाधक बन जाता है। अहंकार हमें और अच्छा सोचने और पाने से रोकने लगता है।
कुछ लोग कहते हैं की हमारे पास जो है उस पर हमें गर्व होना चाहिए। ये बात बहुत हद्द तक ठीक भी लगाती है। लेकिन ये गर्व का भाव किसी भी क्षण हद्द पार कर घमण्ड बन जाता है और हमें पता भी नहीं चलता।
अहंकार में हम किसी और के पास हमसे बेहतर होने की संभावना को अस्वीकार करते हैं।
तो मेरा मानना यह है कि अपने पास जो है उसके अच्छा होने का विचार बुरा नहीं है लेकिन इससे से भी अच्छा हो सकता है इसकी संभावना को स्वीकार कर आगे बढ़ने में ही अपना हित है। मैं, मेरा, एको हम द्वितीय नास्ति, के भाव से ऊपर उठ कर सोचें और उसके अनुसार व्यवहार करें, लाभ में रहेंगे।
मेरी दादी कहती थी कि जब ये लगे की मेँ सर्वोत्तम हूँ या मेरे पास सर्वोत्तम है तब अपने से ऊपर देखना, लाखों करोड़ों और दिखाई देंगे।
अहंकार आर्थिक और मानसिक विकास में बाधक ही है।
Accha bhi hai aur accha ho sakta hai... Ye vichar accha hai... Mera vichar hi uttam hai.. Yeh galat hai... Bahut badiya hai sir.. 🙏
ReplyDeleteAccha bhi hai aur accha ho sakta hai... Ye vichar accha hai... Mera vichar hi uttam hai.. Yeh galat hai... Bahut badiya hai sir.. ��
ReplyDeletedhanyvaad Neeraj ji,. aap isi tarah apane vichaar khule mann se dete rahen..
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