आलोचना
व्यक्ति जब भी किसी के विचार की , रचना की , रूप की , रंग की, आलोचना करता है तो संभवतः ये भूल जाता है की गुण दोष का विवेचन आलोचना है। बस वो दोष ही दोष देखता है और इस उदेश्य से उसका सम्भाषण करता है जिससे वो अधिक से अधिक लोगों तक सम्प्रेषित हो सके। मैं ये नहीं कहता की सब ऐसा करते हैं,लेकिन ये अवश्य कह सकता हूँ की अधिकतर ऐसा ही करते हैं।
तो ये तय है की किसी के व्यक्तित्व की , रचना की, रूप की आलोचना करें तो हम पहले ये देखें की उसमें गुण कितने हैं , दोष कितने हैं फिर उसकी समालोचना करें।
टी.स इलियट जैसे विद्वान कहते हैं की आलोचना स्वतंत्र रूप से से नहीं होनी चाहिए। ये देखना बहुत आवश्यक है की जिस कथन या व्यवहार की हम आलोचना कर रहे हैं उसके देश काल परिस्थिति उद्देश्य आदि को ध्यान में रख कर ही सही आलोचना की जा सकती है। मतलब ये की अगर हम किसी के किसी बात की आलोचना कर रहे हैं तो हमें आलोचना करते समय ये विचार अवश्य करना चाहिए की ये बात उसने किस परिस्थिति में कहा , किस व्यक्ति के लिए कहा,किस बात के लिए कहा और कहने वाले की स्वंय की मानसिक अवस्था उस समय विशेष पर क्या थी, उस वक्तव्य के पीछे उसका उद्देश्य क्या था।
इतना ही नहीं हमें आलोचना करते समय ये विशेष ध्यान रखना चाहिए की हम किसी के एक बात की आलोचना कर रहे हैं न की उसके पुरे व्यक्तित्व की । अक्सर किसी व्यक्ति के किसी ख़ास विचार या वक्तव्य की आलोचना करते-करते हम सीमा पार कर जाते हैं औऱ उसके एक वक्तव्य को उसके व्यक्तित्व से जोड़ देते हैं। इसका परिणाम ये होता है की हम किसी की बात को बुरा मानते हैं तो हम ये कह देने में संकोच नहीं करते की वो आदमी ही बुरा है। ऐसा ही तब होता है जब हम किसी की एक बात में अच्छाई देखते हैं तो हम कह देते हैं की वो आदमी अच्छा है।
वैसे भी बातों या व्यवहार का अच्छा बुरा होना सुनने और समझने वाले के विवेक पर भी निर्भर करता है।
एक और महत्वपूर्ण बात , वो ये की आलोचना का उद्देश्य भी विकासोन्मुख होना चाहिए,. बिना सुधार के उद्देश्य से की गयी आलोचना निंदा मात्र कहलाती है।
व्यक्ति जब भी किसी के विचार की , रचना की , रूप की , रंग की, आलोचना करता है तो संभवतः ये भूल जाता है की गुण दोष का विवेचन आलोचना है। बस वो दोष ही दोष देखता है और इस उदेश्य से उसका सम्भाषण करता है जिससे वो अधिक से अधिक लोगों तक सम्प्रेषित हो सके। मैं ये नहीं कहता की सब ऐसा करते हैं,लेकिन ये अवश्य कह सकता हूँ की अधिकतर ऐसा ही करते हैं।
तो ये तय है की किसी के व्यक्तित्व की , रचना की, रूप की आलोचना करें तो हम पहले ये देखें की उसमें गुण कितने हैं , दोष कितने हैं फिर उसकी समालोचना करें।
टी.स इलियट जैसे विद्वान कहते हैं की आलोचना स्वतंत्र रूप से से नहीं होनी चाहिए। ये देखना बहुत आवश्यक है की जिस कथन या व्यवहार की हम आलोचना कर रहे हैं उसके देश काल परिस्थिति उद्देश्य आदि को ध्यान में रख कर ही सही आलोचना की जा सकती है। मतलब ये की अगर हम किसी के किसी बात की आलोचना कर रहे हैं तो हमें आलोचना करते समय ये विचार अवश्य करना चाहिए की ये बात उसने किस परिस्थिति में कहा , किस व्यक्ति के लिए कहा,किस बात के लिए कहा और कहने वाले की स्वंय की मानसिक अवस्था उस समय विशेष पर क्या थी, उस वक्तव्य के पीछे उसका उद्देश्य क्या था।
इतना ही नहीं हमें आलोचना करते समय ये विशेष ध्यान रखना चाहिए की हम किसी के एक बात की आलोचना कर रहे हैं न की उसके पुरे व्यक्तित्व की । अक्सर किसी व्यक्ति के किसी ख़ास विचार या वक्तव्य की आलोचना करते-करते हम सीमा पार कर जाते हैं औऱ उसके एक वक्तव्य को उसके व्यक्तित्व से जोड़ देते हैं। इसका परिणाम ये होता है की हम किसी की बात को बुरा मानते हैं तो हम ये कह देने में संकोच नहीं करते की वो आदमी ही बुरा है। ऐसा ही तब होता है जब हम किसी की एक बात में अच्छाई देखते हैं तो हम कह देते हैं की वो आदमी अच्छा है।
वैसे भी बातों या व्यवहार का अच्छा बुरा होना सुनने और समझने वाले के विवेक पर भी निर्भर करता है।
एक और महत्वपूर्ण बात , वो ये की आलोचना का उद्देश्य भी विकासोन्मुख होना चाहिए,. बिना सुधार के उद्देश्य से की गयी आलोचना निंदा मात्र कहलाती है।
ये जो बात है कि आलोचना को विकासोन्मुख वर्ना ये निंदा मात्र होगी। सही बात है।
ReplyDeletedhanyvaad Arunji, aapake jaisa saahitya ke jaankaar aur kalaakaar meri kisi baat se sahamat hain ye mere liye badi baat hai..aap issi tarah apani raay dete rahen,.
Deleteप्रभाकरजी, ब्लॉग की शुरुआत के लिए बधाई और शुभकामनाएं!
ReplyDeleteअच्छी शुरुआत. लिखते रहें.
सादर, सस्नेह
प्रवीण रोहिनी
Dhanyvaad Praveen ji Rohini ji,. main likhata rahunga,. aap dono padh kar apani raay dete rahen,.
Deleteजी,ज़रूर.
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