Thursday, May 28, 2020

Who am I

मैं कौन हूँ

किसी के लिए बेटा हूँ किसी के लिए भैया हूँ किसी के लिए पति हूँ, किसी का पिता हूँ , ये सब सम्बोधन सुनते सुनते एक दिन मेरे मन में प्रश्न उठा की वास्तविक में मैं कौन हूँ।  क्या लोग जो मुझे पुकारते हैं मैं वही हूँ।  फिर लगा मैं एक, नाम अनेक , मैं अनेक तो नहीं हो सकता।मैं जो भी हूँ एक ही हूँ।
तो एक कौन हूँ मैं , किसी ने कहा तुम प्रभात हो। लेकिन ये तो मेरा नाम है।  तो क्या इंसान हूँ ये कहना ठीक रहेगा ? फिर लगा की इंसान तो एक सजीव प्राणी के प्रकार नाम है , .... तो फिर ? प्रश्न वहीँ का वहीँ। ......
जो मेरा नाम है वो मैं नहीं तो क्या मेरा जो शरीर है वही मैं हूँ ?? लेकिन मैंने तो खुद ही कहा की ये मेरा शरीर है।  तो वो कौन है जिसका ये शरीर है ? अगर शरीर ही मूल होता तो साँसे रुकने के बाद लोग क्यों कहते हैं की वो नहीं रहे, शरीर तो सामने पड़ा है फिर भी लोग कह रहे हैं की वो नहीं रहे.. क्या सिर्फ इसलिए की वो सांस नहीं ले रहा ? मतलब क्या मैं प्राण वायु हूँ? लेकिन लोगों से ये भी कहते सुना है की उसने अपने प्राण त्याग दिए.. मतलब में प्राण भी नहीं हूँ,.. तो फिर आखिर में हूँ कौन ??
ये मेरे हाथ हैं, ये मेरे कान है, यही कहते हैं सब सो मैं भी कहता हूँ। इसका अर्थ तो यही हुआ की हाथ पैर और सारे अंगों को मिलाकर जो शरीर बना वो मैं नहीं हूँ,.  तो क्या मैं आत्मा हूँ ? लेकिन अगर मैं आत्मा होता तो फिर ये कैसे कहता की मेरी आत्मा पवित्र है ?? फिर सवाल वहीँ के वहीँ की जिसकी आत्मा है वो कौन है ? कौन हूँ मैं,.
अक्सर लोग अपने नाम, उपनाम,पदनाम इत्यादि को ही मान लेते हैं की वो वही है.. किसी को पूछो की आप कौन  हैं तो वो अपना नाम और पदवी बताने लगता है.........  वो अपने नाम या पदवी को ही अपना स्तित्व मानने लगता है।  लेकिन जब वो छूट जाता है, या छिन जाता है तब उसे एहसास होता है की जिस को ले कर अभी तक गुमान कर रहा था , वो या तो व्यक्ति का नाम था या पदवी का....... कुछ लोग कहते हैं की इंसान चला जाता है इस संसार से लेकिन उसके विचार रह जाते हैं।
लेकिन वो तो मेरा विचार मात्र है,. ऐसा कहते हैं की ये मेरा विचार है ,, तोह फिर वो कौन है जिसका ये विचार है,.
जो सुनाई देता है वो मैं नहीं जो दिखाई देता है वो मैं नहीं तो क्या मैं जो कुछ भी हूँ , या जो कोई हूँ वो सूक्ष्म रूप में हूँ,. क्या हमारा वास्तविक स्तित्व सूक्ष्म रूप में है ? पता नहीं। ..... अगर पता नहीं तो दिन भर बकरी की तरह हर बात पर मैं मैं क्यों करता रहता हूँ,.?????  कौन हूँ मैं ??

Saturday, May 23, 2020

Ego

अहंकार 

रावण जैसे शक्तिशाली के विनाश का कारण बना अहंकार, ऐसा रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा। अहंकार इंसान को भ्रष्ट और फिर नष्ट कर देता है ऐसा अमूमन कहा जाता है। 
तो ये अहंकार है क्या ? क्या यह सच में इतना विनाशकारी है?
आज के आधुनिक युग में जब हमें अपने कार्य के वातावरण में, जहां इतनी प्रतिस्पर्धा है, आगे बढ़ने की होड़ है, और के बाद और अधिक पाने की चाह है, क्या ये अहंकार हमारा सहायक है ? या विरोधी है?
अहंकार एक भाव का नाम है, एक मानसिक अवस्था का नाम है। 
जब हमें ये लगता है की जो हम हैं, जो हमारा है वो अच्छा है, दूसरे से बेहतर है, चाहे वो विचार हो या सामान, तब ये अहंकार है। हम उसकी उत्तमता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।  इस प्रयास के आवेग में हम दूसरे के विचार या सामान को निम्न मान कर उसे सुनना और देखना बंद कर देते हैं।  जीवन के इस पड़ाव पर ये भाव हमारे विकास का बाधक बन जाता है।  अहंकार हमें और अच्छा सोचने और पाने से रोकने लगता है। 
कुछ लोग कहते हैं की हमारे पास जो है उस पर हमें गर्व होना चाहिए।  ये बात बहुत हद्द तक ठीक भी लगाती है। लेकिन ये गर्व का भाव किसी भी क्षण हद्द पार कर घमण्ड बन जाता है और हमें पता भी नहीं चलता। 
अहंकार में हम किसी और के पास हमसे बेहतर होने की संभावना को अस्वीकार करते हैं। 
तो मेरा मानना यह है कि अपने पास जो है उसके अच्छा होने का विचार बुरा नहीं है लेकिन इससे से भी अच्छा हो सकता है इसकी संभावना को स्वीकार कर आगे बढ़ने में ही अपना हित है। मैं, मेरा, एको हम द्वितीय नास्ति, के भाव से ऊपर उठ कर सोचें और उसके अनुसार व्यवहार करें, लाभ में रहेंगे। 
मेरी दादी कहती थी कि जब ये लगे की मेँ सर्वोत्तम हूँ या मेरे पास सर्वोत्तम है तब अपने से ऊपर देखना, लाखों करोड़ों और दिखाई देंगे। 
अहंकार आर्थिक और मानसिक विकास में बाधक ही है।

Thursday, May 14, 2020

Criticise

आलोचना 
व्यक्ति जब भी किसी के विचार की , रचना की , रूप की , रंग की, आलोचना  करता है  तो  संभवतः ये भूल जाता है की गुण दोष का विवेचन आलोचना  है।  बस वो दोष ही  दोष  देखता  है  और  इस उदेश्य  से उसका सम्भाषण करता है जिससे वो अधिक से अधिक लोगों तक सम्प्रेषित हो सके।  मैं ये नहीं कहता की सब ऐसा करते हैं,लेकिन ये अवश्य कह सकता हूँ की अधिकतर ऐसा ही करते हैं। 
तो ये तय है की किसी के व्यक्तित्व की , रचना की, रूप की  आलोचना करें तो हम पहले ये देखें की उसमें गुण कितने हैं , दोष कितने हैं  फिर उसकी समालोचना करें।  
टी.स इलियट जैसे विद्वान कहते हैं की आलोचना स्वतंत्र रूप से से नहीं होनी चाहिए।  ये देखना बहुत आवश्यक है की जिस कथन या व्यवहार की हम आलोचना कर रहे हैं उसके देश काल परिस्थिति उद्देश्य आदि को ध्यान में रख कर ही सही आलोचना की जा सकती है।  मतलब ये की अगर हम किसी के किसी बात की आलोचना कर रहे हैं  तो हमें  आलोचना करते समय ये विचार अवश्य करना चाहिए की ये बात उसने किस परिस्थिति में कहा , किस व्यक्ति के लिए कहा,किस बात के लिए कहा और कहने वाले की स्वंय की मानसिक अवस्था उस समय विशेष पर क्या थी, उस वक्तव्य के पीछे उसका उद्देश्य क्या था। 
इतना ही नहीं हमें आलोचना करते समय ये विशेष ध्यान रखना चाहिए की हम किसी के एक  बात की आलोचना कर रहे हैं न की उसके पुरे व्यक्तित्व की ।  अक्सर किसी व्यक्ति के किसी ख़ास विचार या वक्तव्य की आलोचना करते-करते  हम सीमा पार कर जाते हैं औऱ उसके एक वक्तव्य को उसके व्यक्तित्व से जोड़ देते हैं।  इसका परिणाम ये होता है की हम किसी की बात को बुरा मानते हैं तो हम ये कह देने में संकोच नहीं करते की वो आदमी ही बुरा है। ऐसा ही तब होता है जब हम किसी की एक बात में अच्छाई  देखते हैं तो हम कह देते हैं की वो आदमी अच्छा है। 
वैसे भी बातों या व्यवहार का अच्छा बुरा होना सुनने और समझने वाले के विवेक पर भी निर्भर करता है। 
एक और महत्वपूर्ण बात , वो ये की आलोचना का उद्देश्य भी विकासोन्मुख होना चाहिए,. बिना सुधार के उद्देश्य से की गयी आलोचना निंदा मात्र कहलाती है।