मैं कौन हूँ
किसी के लिए बेटा हूँ किसी के लिए भैया हूँ किसी के लिए पति हूँ, किसी का पिता हूँ , ये सब सम्बोधन सुनते सुनते एक दिन मेरे मन में प्रश्न उठा की वास्तविक में मैं कौन हूँ। क्या लोग जो मुझे पुकारते हैं मैं वही हूँ। फिर लगा मैं एक, नाम अनेक , मैं अनेक तो नहीं हो सकता।मैं जो भी हूँ एक ही हूँ।
तो एक कौन हूँ मैं , किसी ने कहा तुम प्रभात हो। लेकिन ये तो मेरा नाम है। तो क्या इंसान हूँ ये कहना ठीक रहेगा ? फिर लगा की इंसान तो एक सजीव प्राणी के प्रकार नाम है , .... तो फिर ? प्रश्न वहीँ का वहीँ। ......
जो मेरा नाम है वो मैं नहीं तो क्या मेरा जो शरीर है वही मैं हूँ ?? लेकिन मैंने तो खुद ही कहा की ये मेरा शरीर है। तो वो कौन है जिसका ये शरीर है ? अगर शरीर ही मूल होता तो साँसे रुकने के बाद लोग क्यों कहते हैं की वो नहीं रहे, शरीर तो सामने पड़ा है फिर भी लोग कह रहे हैं की वो नहीं रहे.. क्या सिर्फ इसलिए की वो सांस नहीं ले रहा ? मतलब क्या मैं प्राण वायु हूँ? लेकिन लोगों से ये भी कहते सुना है की उसने अपने प्राण त्याग दिए.. मतलब में प्राण भी नहीं हूँ,.. तो फिर आखिर में हूँ कौन ??
ये मेरे हाथ हैं, ये मेरे कान है, यही कहते हैं सब सो मैं भी कहता हूँ। इसका अर्थ तो यही हुआ की हाथ पैर और सारे अंगों को मिलाकर जो शरीर बना वो मैं नहीं हूँ,. तो क्या मैं आत्मा हूँ ? लेकिन अगर मैं आत्मा होता तो फिर ये कैसे कहता की मेरी आत्मा पवित्र है ?? फिर सवाल वहीँ के वहीँ की जिसकी आत्मा है वो कौन है ? कौन हूँ मैं,.
अक्सर लोग अपने नाम, उपनाम,पदनाम इत्यादि को ही मान लेते हैं की वो वही है.. किसी को पूछो की आप कौन हैं तो वो अपना नाम और पदवी बताने लगता है......... वो अपने नाम या पदवी को ही अपना स्तित्व मानने लगता है। लेकिन जब वो छूट जाता है, या छिन जाता है तब उसे एहसास होता है की जिस को ले कर अभी तक गुमान कर रहा था , वो या तो व्यक्ति का नाम था या पदवी का....... कुछ लोग कहते हैं की इंसान चला जाता है इस संसार से लेकिन उसके विचार रह जाते हैं।
लेकिन वो तो मेरा विचार मात्र है,. ऐसा कहते हैं की ये मेरा विचार है ,, तोह फिर वो कौन है जिसका ये विचार है,.
जो सुनाई देता है वो मैं नहीं जो दिखाई देता है वो मैं नहीं तो क्या मैं जो कुछ भी हूँ , या जो कोई हूँ वो सूक्ष्म रूप में हूँ,. क्या हमारा वास्तविक स्तित्व सूक्ष्म रूप में है ? पता नहीं। ..... अगर पता नहीं तो दिन भर बकरी की तरह हर बात पर मैं मैं क्यों करता रहता हूँ,.????? कौन हूँ मैं ??
किसी के लिए बेटा हूँ किसी के लिए भैया हूँ किसी के लिए पति हूँ, किसी का पिता हूँ , ये सब सम्बोधन सुनते सुनते एक दिन मेरे मन में प्रश्न उठा की वास्तविक में मैं कौन हूँ। क्या लोग जो मुझे पुकारते हैं मैं वही हूँ। फिर लगा मैं एक, नाम अनेक , मैं अनेक तो नहीं हो सकता।मैं जो भी हूँ एक ही हूँ।
तो एक कौन हूँ मैं , किसी ने कहा तुम प्रभात हो। लेकिन ये तो मेरा नाम है। तो क्या इंसान हूँ ये कहना ठीक रहेगा ? फिर लगा की इंसान तो एक सजीव प्राणी के प्रकार नाम है , .... तो फिर ? प्रश्न वहीँ का वहीँ। ......
जो मेरा नाम है वो मैं नहीं तो क्या मेरा जो शरीर है वही मैं हूँ ?? लेकिन मैंने तो खुद ही कहा की ये मेरा शरीर है। तो वो कौन है जिसका ये शरीर है ? अगर शरीर ही मूल होता तो साँसे रुकने के बाद लोग क्यों कहते हैं की वो नहीं रहे, शरीर तो सामने पड़ा है फिर भी लोग कह रहे हैं की वो नहीं रहे.. क्या सिर्फ इसलिए की वो सांस नहीं ले रहा ? मतलब क्या मैं प्राण वायु हूँ? लेकिन लोगों से ये भी कहते सुना है की उसने अपने प्राण त्याग दिए.. मतलब में प्राण भी नहीं हूँ,.. तो फिर आखिर में हूँ कौन ??
ये मेरे हाथ हैं, ये मेरे कान है, यही कहते हैं सब सो मैं भी कहता हूँ। इसका अर्थ तो यही हुआ की हाथ पैर और सारे अंगों को मिलाकर जो शरीर बना वो मैं नहीं हूँ,. तो क्या मैं आत्मा हूँ ? लेकिन अगर मैं आत्मा होता तो फिर ये कैसे कहता की मेरी आत्मा पवित्र है ?? फिर सवाल वहीँ के वहीँ की जिसकी आत्मा है वो कौन है ? कौन हूँ मैं,.
अक्सर लोग अपने नाम, उपनाम,पदनाम इत्यादि को ही मान लेते हैं की वो वही है.. किसी को पूछो की आप कौन हैं तो वो अपना नाम और पदवी बताने लगता है......... वो अपने नाम या पदवी को ही अपना स्तित्व मानने लगता है। लेकिन जब वो छूट जाता है, या छिन जाता है तब उसे एहसास होता है की जिस को ले कर अभी तक गुमान कर रहा था , वो या तो व्यक्ति का नाम था या पदवी का....... कुछ लोग कहते हैं की इंसान चला जाता है इस संसार से लेकिन उसके विचार रह जाते हैं।
लेकिन वो तो मेरा विचार मात्र है,. ऐसा कहते हैं की ये मेरा विचार है ,, तोह फिर वो कौन है जिसका ये विचार है,.
जो सुनाई देता है वो मैं नहीं जो दिखाई देता है वो मैं नहीं तो क्या मैं जो कुछ भी हूँ , या जो कोई हूँ वो सूक्ष्म रूप में हूँ,. क्या हमारा वास्तविक स्तित्व सूक्ष्म रूप में है ? पता नहीं। ..... अगर पता नहीं तो दिन भर बकरी की तरह हर बात पर मैं मैं क्यों करता रहता हूँ,.????? कौन हूँ मैं ??