प्रजातंत्र और भाषा का सम्बन्ध बहुत ही वैज्ञानिक है। ये तो हम सब जानते हैं की भाषा सम्प्रेषण का माध्यम है। हमेशा ये भी कहा जाता रहा है की लोकतंत्र या प्रजातंत्र में अपने भाव,विचार प्रकट करने की आज़ादी सबसे बड़ा स्थान रखती है। सम्प्रेषण की आज़ादी भाषा की स्वतंत्रता ही है। भाषा केबिना लोकतंत्र का विकास संभव नहीं। लोकतांत्रिक भाषा जैसे शब्दों का प्रयोग अक्सर होता है।
क्या है ये लोकतांत्रिक भाषा ? क्या भाषा की भी ज़िम्मेदारी है लोकतंत्र के विकास का बोझ कंधे पर धोने की ? इसका उत्तर ऐतिहासिक परिश्थितियां देती हैं। राजतंत्र की हमेशा आदेशात्मक रही है, जिसमें कभी भी लोक मनोभावों का स्थान नहीं रहा। लेकिन लोकतांत्रिक भाषा में समाज और समाज निर्माण में हिस्सेदारी निभाते लोगों को हमेशा उचित स्थान देने की परंपरा रही है। ऐसी भाषा का प्रयोग लोकतंत्र के लिए आवश्यक है जिस में लोकहित हो , उनकी मर्यादा का ध्यान रखा जाय। तंत्र और तंत्र से जुड़े सभी लोग अपनी भाषा का प्रयोग लोकहित को ध्यान में रख कर करें यही अपेक्षित है , और यही लोकतंत्र की मर्यादा है। इस तरह भाषा की जीतनी ज़िम्मेदारी लोकतंत्र के प्रति है उतनी ही ज़िम्मेदारी लोकतंत्र की भाषा के प्रति है।
इतिहास गवाह है की जब भी भाषा के अंदर ईर्ष्या और द्वेष को स्थान मिला वहीँ से लोकतंत्र का पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा जैसे ही अलोकतांत्रिक हुई लोकतंत्र के विघटन का संकेत मिलना शुरू हुआ। भाषा ने हमेशा इस बात का संकेत दिया की लोकतंत्र के प्रति शाषकों की निष्ठा समाप्त हो रही है।
आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग राजनेता कर रहे हैं ये साफ़ संकेत दे रहा है की लोकतंत्र खतरे में है। दुःख की बात की जो लोकतंत्र को ख़तम करने की दिशा में काम कर रहे हैं वही कहते पाये जाते हैं की हमारे देश का लोकतंत्र इतना कमज़ोर नहीं है की ख़तम हो जाय। ऐसे लोग भाषा की ताक़त को भूल जाते हैं की मनोभाव को भाषा सबके सामने ले आती है, भाषा लोगों को जोड़ने का काम करती है तो तोड़ने का काम भी करती है। मेरी दादी कहा करती थी "यही जीभ मिठाई खिलाता है और यही जीभ जूते खिलाता है ". इसका अर्थ बहुत बाद में समझ में आया। भाषा की ही ताक़त थी की स्वास्थ के कारण पंद्रह सालों से राजनीति से दूर रहने वाले अटल बिहारी बाजपेई जी के अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए।
लोकतंत्र को बचाना है तो भाषा की मर्यादा को समझना होगा। राजनेताओं से विशेष अनुरोध है बहुत मुश्किल से मिले इस लोकतंत्र को बर्बाद होने से रोकिये , भाषा पे ध्यान दीजिये।
क्या है ये लोकतांत्रिक भाषा ? क्या भाषा की भी ज़िम्मेदारी है लोकतंत्र के विकास का बोझ कंधे पर धोने की ? इसका उत्तर ऐतिहासिक परिश्थितियां देती हैं। राजतंत्र की हमेशा आदेशात्मक रही है, जिसमें कभी भी लोक मनोभावों का स्थान नहीं रहा। लेकिन लोकतांत्रिक भाषा में समाज और समाज निर्माण में हिस्सेदारी निभाते लोगों को हमेशा उचित स्थान देने की परंपरा रही है। ऐसी भाषा का प्रयोग लोकतंत्र के लिए आवश्यक है जिस में लोकहित हो , उनकी मर्यादा का ध्यान रखा जाय। तंत्र और तंत्र से जुड़े सभी लोग अपनी भाषा का प्रयोग लोकहित को ध्यान में रख कर करें यही अपेक्षित है , और यही लोकतंत्र की मर्यादा है। इस तरह भाषा की जीतनी ज़िम्मेदारी लोकतंत्र के प्रति है उतनी ही ज़िम्मेदारी लोकतंत्र की भाषा के प्रति है।
इतिहास गवाह है की जब भी भाषा के अंदर ईर्ष्या और द्वेष को स्थान मिला वहीँ से लोकतंत्र का पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा जैसे ही अलोकतांत्रिक हुई लोकतंत्र के विघटन का संकेत मिलना शुरू हुआ। भाषा ने हमेशा इस बात का संकेत दिया की लोकतंत्र के प्रति शाषकों की निष्ठा समाप्त हो रही है।
आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग राजनेता कर रहे हैं ये साफ़ संकेत दे रहा है की लोकतंत्र खतरे में है। दुःख की बात की जो लोकतंत्र को ख़तम करने की दिशा में काम कर रहे हैं वही कहते पाये जाते हैं की हमारे देश का लोकतंत्र इतना कमज़ोर नहीं है की ख़तम हो जाय। ऐसे लोग भाषा की ताक़त को भूल जाते हैं की मनोभाव को भाषा सबके सामने ले आती है, भाषा लोगों को जोड़ने का काम करती है तो तोड़ने का काम भी करती है। मेरी दादी कहा करती थी "यही जीभ मिठाई खिलाता है और यही जीभ जूते खिलाता है ". इसका अर्थ बहुत बाद में समझ में आया। भाषा की ही ताक़त थी की स्वास्थ के कारण पंद्रह सालों से राजनीति से दूर रहने वाले अटल बिहारी बाजपेई जी के अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए।
लोकतंत्र को बचाना है तो भाषा की मर्यादा को समझना होगा। राजनेताओं से विशेष अनुरोध है बहुत मुश्किल से मिले इस लोकतंत्र को बर्बाद होने से रोकिये , भाषा पे ध्यान दीजिये।
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