Wednesday, June 24, 2020

Crime

मारना ही जुर्म क्यों है पैदा करना क्यों नहीं,,,,

आज मैंने एक फ़िल्म देखा " बोल ".. इस फ़िल्म ने एक सवाल खड़े किये और उस सवाल ने मेरे मन मस्तिष्क को झकझोर दिया,, ये सवाल मेरे अंदर भी सवाल दर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो सोचा क्यों न आप सबसे भी चर्चा की जाय, या यूँ कहें की ये गन्दी बात आपसे करने की इच्छा प्रबल हो गई ,.
सवाल वही है "मारना ही जुर्म क्यों है पैदा करना क्यों नहीं " ??
हमारे देश में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनके घर बेटियाँ ही हैं तो बेटे की चाह में या बेटे ही हैं तो बेटी की चाह में बच्चे पैदा किये जाते हैं,. ऐसे परिवार में अक्सर उस माँ की या उस औरत की चाह पूछी ही नहीं जाती की उसकी क्या इच्छा है या उसका शरीर अगले संतान के लिए कितना तैयार है। .मैं ये नहीं कहता की बदलाव नहीं आया है , बदलाव आया है जहां जिस घर में लडकियां पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर बनी हैं बस वहीं बहुत हद्द तक ये संभव हो पाया है ,,, शायद ,,शायद इसलिए की बहुत सारे पढ़े - लिखे लोगों के बीच भी अभी बेटे और बेटियों की चाह में ज़रुरत के हिसाब से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा। कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है।
बहुत सारे लोग बच्चे को खुदा की नेमत मानते हैं या भगवान का आशीर्वाद , उनकी इच्छा,, और ये भी की ईश्वर और अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाना पाप है सो हम अपना कर्म कर रहे हैं बाकी उनकी मर्ज़ी,. मुझे नहीं पता इस विश्वास में कितनी  सच्चाई है ,, शायद सच भी हो,,  लेकिन अगर ये सच है तो सच ये भी है की ऐसे विश्वास को बढ़ावा देने वाले लोग अपने सुविधानुसार बहुत सारे पाप किये जाते हैं जो इंसानियत को शर्मशार करे। तब वो भूल जाते हैं की ईश्वर और अल्लाह इसकी इजाज़त नहीं देता,,
घर में जितने लोग हैं उनके खाने और तन ढ़कने को पैसे नहीं और बच्चे पैदा किये जा रहे हैं,., उस माँ के अंदर खून का कतरा नहीं लेकिन बच्चे पैदा किये जा रहे ,, और जब नहीं संभाल पाते तो कभी अनाथालय के दरवाज़े पर तो कभी सडकों पर छोड़ जाते हैं,,
तो सवाल उठता है की ऐसे लोगों के लिए बच्चे पैदा करना कानूनन जुर्म क्यों नहीं ,, चाहे सड़क पर भूख से बिलखता बच्चा हो आप उसे नहीं मार सकते , क्यों की कानूनन जुर्म है,, अच्छी बात है होना भी चाहिए क्यूंकि आप ने इंसान को मारा है ,, लेकिन उसे पैदा करने वाले को गुनेहगार क्यों नहीं माना जाता।
मेरी व्यक्तिगत राय तो यही है की ऐसे हालात में बच्चे पैदा करना भी जुर्म माना जाना चाहिए,,
एक बार सोच कर देखिये,, ज़रूर सोचिये ,,

Tuesday, June 23, 2020

Democracy and Language

प्रजातंत्र और भाषा का सम्बन्ध बहुत ही वैज्ञानिक है। ये तो हम सब जानते हैं की भाषा सम्प्रेषण का माध्यम है।  हमेशा ये भी कहा जाता रहा है की लोकतंत्र या प्रजातंत्र में अपने भाव,विचार प्रकट करने की आज़ादी सबसे बड़ा स्थान रखती  है।  सम्प्रेषण की आज़ादी भाषा की स्वतंत्रता ही है।  भाषा केबिना लोकतंत्र का विकास संभव नहीं। लोकतांत्रिक भाषा जैसे शब्दों का प्रयोग अक्सर होता है।
क्या है ये लोकतांत्रिक भाषा ? क्या भाषा की भी ज़िम्मेदारी है लोकतंत्र के विकास का बोझ कंधे पर धोने की ? इसका उत्तर ऐतिहासिक परिश्थितियां देती हैं। राजतंत्र की  हमेशा आदेशात्मक रही है, जिसमें कभी भी लोक मनोभावों का स्थान नहीं रहा। लेकिन लोकतांत्रिक भाषा में समाज और समाज  निर्माण में हिस्सेदारी निभाते लोगों को हमेशा उचित स्थान देने की परंपरा रही है। ऐसी भाषा का प्रयोग लोकतंत्र के लिए आवश्यक है जिस में लोकहित हो , उनकी मर्यादा का ध्यान रखा जाय। तंत्र और तंत्र से जुड़े सभी लोग अपनी भाषा का प्रयोग लोकहित को ध्यान में रख कर करें यही अपेक्षित है , और यही लोकतंत्र की मर्यादा है। इस तरह भाषा की जीतनी ज़िम्मेदारी लोकतंत्र के प्रति है उतनी ही ज़िम्मेदारी लोकतंत्र की भाषा के प्रति है।
इतिहास गवाह है की जब भी भाषा के अंदर ईर्ष्या और द्वेष को स्थान मिला वहीँ से लोकतंत्र का पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा जैसे ही अलोकतांत्रिक हुई लोकतंत्र के विघटन का संकेत मिलना शुरू हुआ। भाषा ने हमेशा इस बात का संकेत दिया की लोकतंत्र के प्रति शाषकों की निष्ठा समाप्त हो रही है।
आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग राजनेता कर रहे हैं ये साफ़ संकेत दे रहा है की लोकतंत्र खतरे में है।  दुःख की बात  की जो लोकतंत्र को ख़तम करने की दिशा में काम कर रहे हैं वही कहते पाये जाते हैं की हमारे देश का लोकतंत्र इतना कमज़ोर नहीं है की ख़तम हो जाय। ऐसे लोग भाषा की ताक़त को भूल जाते हैं की मनोभाव को भाषा सबके सामने ले आती है, भाषा लोगों को जोड़ने का काम करती है तो तोड़ने का काम भी करती है। मेरी दादी कहा करती थी "यही जीभ मिठाई खिलाता है और यही जीभ जूते खिलाता है ". इसका अर्थ बहुत बाद में समझ में आया।  भाषा की ही ताक़त थी की स्वास्थ के कारण पंद्रह सालों से राजनीति से दूर रहने वाले अटल बिहारी बाजपेई जी के अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए।
लोकतंत्र को बचाना है तो भाषा की मर्यादा को समझना होगा। राजनेताओं से विशेष अनुरोध है बहुत मुश्किल से मिले इस लोकतंत्र को बर्बाद होने से रोकिये , भाषा पे ध्यान दीजिये।